Saturday, 20 October 2012

reserch on yadav by a japanse proffesor

राम बालक रॉय पोस्ट 20अक्टोबर 2012
Japanese scholar maps complex caste equations in Bihar


Fascinated by the intricate caste equations which have played a decisive role in determining the fortunes of political parties in Bihar, a Japanese scholar has been visiting the state since 1974, when socialist leader Jayaprakash Narayan launched the 'Total Revolution'.
Ohashi Masaaki, a professor of rural sociology at Keisen University in Japan, has been closely mapping the vicissitudes of the Yadav community in Bihar.
Masaaki (58) has now returned to his 'favourite' place to do extensive research on the lifestyle of Yadavs living in the rural areas of the state.
"I am doing an academic research on the social, economic, political and other aspects of the Yadav community in Bihar under the Nitish Kumar-led government," Masaaki said.
He said the Yadavs had emerged politically stronger after their leader Ram Lakhan Singh Yadav, a former MP, organised a convention at Gaya in 1976. "But they became a real political force to reckon with after RJD president Lalu Yadav came to power," Masaaki added.
Masaaki thinks the caste equations in Bihar are changing under the incumbent chief minister Nitish Kumar and it would be interesting to study the position of the Yadavs from a fresh perspective now.
"The majority of Yadavs strongly supported Lalu when he was in power, but that is not the case now," he said. "They have split and joined other parties."
The Japanese professor said the caste system had somewhat weakened in Bihar but it could not be done away with entirely because of the politics of vote bank in the state.
This is not the first time that Masaki is doing research on a particular caste in the state. "I have already done research work on various castes and communities in Bihar such as Pasi, Teli, Kurmi, Koeri and Bhuiyan, also known as Mushhars," he said.
He said the Kurmis and Keoris had earlier come together under the 'Luv-Kush' front but had fallen apart.
Masaaki said he had found out during the course of his research that the social and economic conditions of the underprivileged castes such as Bhuiyans from Gaya had hardly changed over the years.
"I have been studying Bihar's caste system for the past 12 years but I have not noticed any perceptible change in their lifestyle," he said.
"Other castes such as Pasis and Telis have forged ahead in their lives, thanks to their business," Masaaki added.


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Sunday, 7 October 2012

hotal rajnity aur lekhak ki kahani

रविवार से साभार
अरुण प्रकाश 4 वर्षों से ज्यादा समय से फेफड़े की बीमारी एम्फीसीमिया से ग्रस्त होकर कृत्रिम ऑक्सीजन के सहारे जीवित थे. उनका घर ही अस्पताल हो गया था. पत्नी वीणा प्रकाश अस्पताल की परिचारिका, नर्स की भूमिका में ऑक्सीजन की नली से उन्हें हर वक्त जुड़े रखने और उनकी पल-पल बढ़ती परेशानियों में उनकी निकट सहयोगी थीं. मुझे हर बार ऐसा लगता था कि उनके पास कुछ ऐसी बातें कहने के लिए हैं, जो उनने अब तक किसी से नहीं कही हो और अब वे मुझे बतायेंगे. मैं इसी उम्मीद, मोह के साथ उनके पास दौड़ता रहा. मैं कभी खाली नहीं लौटा, लेकिन कुछ बातें ऐसी थीं, जो वे मुझसे भी कह नहीं पाये. बीमारी के बाद अस्पताल की सुविधा के लिए दिलशाद-गार्डेन का घर छोड़कर मयूर विहार स्थित किराए के घर में वे रहने लगे.

एक दिन उनके घर में ऑक्सीजन सिलेण्डर और किचन का सिलेण्डर दोनों एक ही दिन बाजार से आया. मैंने हँसते हुए उनसे कहा- क्या हो गया, चूल्हे को जलाने के लिए सिलेण्डर, आदमी को जिलाने के लिए सिलेण्डर? एक घर में दो तरह के सिलेण्डर. उनने हँसते हुए कहा- देखो एक ही जलावन चूल्हे की आंच भी है और अर्थी की आग भी. इसलिए सिलेण्डर के प्रकार पर क्या चिंतन कर रहो हो.

10 दिसंबर 2010 की यह बातचीत मयूर विहार स्थित उनके आवास पर हमने लिपिबद्ध की है. उस समय उन्हें रोज 16-18 घंटे ऑक्सीजन की दरकार होती थी. बात करते-करते अचानक वे किसी दूसरे विषय पर चले जाते थे. दरअसल ऐसा ऑक्सीजन की कमी होने पर साँस फूलने से होता था. अरुण प्रकाश की अदम्य जीवन यात्रा पर यह संभवतः उनके जीवन का अंतिम साक्षात्कार है.


n अपने जीवन संघर्ष का वह हिस्सा जो कहीं दर्ज नहीं है? अरुण प्रकाश के कथाकार बनने की संघर्ष गाथा क्या है?

राजनीतिक माहौल में मैं पला-बढ़ा पर राजनीति में मेरी दिलचस्पी नहीं थी. मैंने हायर सेकेण्डरी मंझौल से की थी और ग्रेजुऐशन करने शाहपुर-पटोरी आ गया था. मैं विज्ञान का छात्र था और टायफाइड से लंबे समय तक बीमार रहने के कारण दो पेपर में फेल हो गया था.

अच्छा, मैंने यह नहीं बताया कि मैं शाहपुर-पटोरी कैसे और क्यों पहुँचा था? कर्पूरी ठाकुर ने अपने इलाके में डिग्री कॉलेज खोला था तो मेरे पिता से घरेलू रिश्ते की वजह से मुझे अपने कॉलेज में दाखिला कराया था. इस कॉलेज का नाम आचार्य नरेन्द्रदेव महाविद्यालय था. कर्पूरी जी ने मुझे एक साइकिल खरीद कर दी थी. जब कर्पूरी जी पटना से अपने इलाके आते थे तो मेरी साइकिल से क्षेत्र भ्रमण करते थे और लौटते हुए मछली साथ लाते थे. चाचा-भतीजा साथ-साथ मछली बनाते और खूब चाव से खाते थे.

राममनोहर लोहिया जाति-तोड़ो आंदोलन में शाहपुर-पटोरी आये थे. रेलवे मैदान में लोहिया की बड़ी रैली हुई थी. मुझे कर्पूरी चाचा ने लोहिया के साथ लगा दिया था. पहली मुलाकात में ही लोहिया ने मेरे स्वभाव और प्रकृति को देखते हुए पूछा- तुम क्यों आ गये सोशलिस्टों के साथ? मैंने कहा- मैं सोशलिस्ट बनने नहीं, जाति-तोड़ो आंदोलन में सहयोग करने आया हूँ. डॉ. ब्रह्मदेव और शरण जी जाति-तोड़ो आदोलन में स्थानीय संयोजक थे. उस जाति-तोड़ो रैली में 25-30 हजार लोग जुटे थे. कर्पूरी जी सिर्फ नाइयों के नेता नहीं थे, वह इस रैली से साबित हो गया था. मुझे आश्चर्य होता है कि कालांतर में समाजवादी जाति तोड़ने के बजाय जाति में खाद डालने लगे.

n आप क्या आर्थिक संकट की वजह से शाहपुर-पटोरी पढ़ने गये थे?

और वजह क्या हो सकती है? हमारे पास दूसरा विकल्प ही क्या था? पिताजी सोशलिस्ट पार्टी के होलटाइमर थे. उन्हें पूर्णकालिक कार्यकर्ता का मानदेय 40 रुपये मासिक मिलता था. इस 40 रुपये से परिवार चलाना और बच्चों को पढ़ाना कैसे संभव था? कर्पूरी जी खुद मुझे लेकर शाहपुर-पटोरी आये थे तो कॉलेज की फीस माफ कर दी गयी थी. शाहपुर-पटोरी का यह ढेढ़ साल ऐतिहासिक है. बीएससी फेल का तमगा और जाति-तोड़ो आंदोलन में शरीक होने का आत्मगौरव. तब मेरी उम्र 18 वर्ष की थी. कॉलेज में फेल होने से हौसला फेल नहीं हुआ था. मैं शाहपुर-पटोरी का आभारी और ऋणी हूँ. वहाँ विनोद जायसवाल मेरे दोस्त थे.

n आप अपने पिताजी के बारे में कुछ बतायेंगे? उन्होंने आपके जीवन को किस तरह प्रभावित किया है?

मेरे पिताजी का नाम रूद्रनारायण झा था. परंपरागत तौर से पुश्तैनी पंडिताई, पुरोहित उनके जीवन का पेशा होता, अगर वे राजनीति में नहीं आते. वे खूब पैदल चलते थे और फकीरी जिंदगी जीते थे. पिताजी 1967 में मुंगेर जिला संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव और प्रदेश चुनाव प्रभारी थे. मधु लिमये को मुंगेर लोकसभा से प्रत्याशी बनाया गया था. बिहार की सोशलिस्ट पार्टी का एक बड़ा हिस्सा नहीं चाहता था कि महाराष्ट्र के मधु लिमये को मुंगेर से चुनाव लड़ाया जाये. मधु लिमये की जीत को पिताजी ने प्रतिष्ठा का सवाल बना लिया था. मधु लिमये दो बार मुंगेर से सांसद हुए. पिताजी 1968 में राज्यसभा से सांसद हुए. 1970 में एक साजिश के तहत पिताजी की सड़क दुघर्टना में हत्या हुई, जिसे सड़क दुर्घटना में मौत कहकर प्रचारित किया गया. यह सड़क दुर्घटना नहीं, राजनीतिक हत्या थी. सीबीआई जाँच भी हुई पर दोषी कौन, यह रहस्य सार्वजनिक नहीं हुआ. किसी को सजा नहीं मिली. उनकी मौत के बाद पार्टी रैली के लिए रेल बुकिंग का बकाया किराया 38 हजार रुपये और उनके बैंक खाते में 238 रुपये मात्र, यही उनकी जिंदगी थी. उनकी मृत्यु के बाद एसएम जोशी ने पार्टी फंड से रेल किराया का बकाया चुकती कराया और मेरे परिवार को रेल ऋण के बोझ से मुक्ति मिली.

n जब पिताजी की मौत हुई उस समय आप क्या कर रहे थे? आपने खुद को किस तरह खड़ा किया?

शाहपुर-पटोरी से बीएससी फेल की उपलब्धि के साथ मैं अपने गाँव निपनिया, बरौनी वापस लौट आया था. सातवीं तक के बच्चों को विज्ञान-हिन्दी का ट्यूशन पढ़ाकर मैं खुद को संभालने की कोशिश कर रहा था. जानकारी मिली कि भुवनेश्वर से बिना बीए किए बीएड करना संभव है. उधर प्रवेश परीक्षा दिया तो भुवनेश्वर में बीएड और पूसा एग्रीकल्चर में बीएससी, कृषि में एक साथ सफलता मिली. बीएड और बीएससी, कृषि दोनों में कंपीट होना उस समय बहुत सहज नहीं था. अब पिता के पास इतने पैसे नहीं थे कि मुझे पूसा या भुवनेश्वर पढ़ने के लिए भेज सकें. वे बेटे को पढ़ाने के लिए ना ही किसी के सामने हाथ पसार सकते थे, ना ही इसे मुद्दा बना सकते थे. उन्होंने सब कुछ सहज तरीके से स्वीकार किया और मुझे हताशा से बचाया.मैं शाहपुर-पटोरी अपना अंक पत्र लेने गया तो मेरे हिस्से का स्कॉलरशिप आया हुआ था. उस स्कालरशिप के पैसे की मैंने कोई कल्पना भी नहीं की थी. इस पैसे से कॉलेज का कुछ बकाया भी चुकाया और उत्साहित होकर बेगूसराय जीडी कॉलेज में केमेस्ट्री ऑनर्स में दाखिला लिया. पास कोर्स में मैं फेल हो गया. इस बार मैं बीमार नहीं हुआ था. फेल होने का कीर्तिमान भी मुझे ही कायम करना था. इसी समय एक फिल्म में होटल मैनेजमेंट के लड़कों को डायनेमिक पर्सनॅाल्टी में देखा तो मन पुलकित हो गया. यह दौर जीवन में सपनों में कुछ नया करने का था. कहीं से जानकारी मिली कि पूसा इंस्टीट्यूट ऑफ होटल मैनेजमेंट, दिल्ली में हायर सेकेण्डरी की डिग्री के आधार पर प्रवेश संभव है. पिताजी सांसद होकर दिल्ली आ गये थे तो दिल्ली में पढ़ाई अब संभव हो गया था. 1968 में दिल्ली में होटल मैनेजमेंट में अपना दाखिला हो गया. मैनेजमेंट की पढ़ाई के बीच ही पिताजी की हत्या हो गयी. पिताजी के न होने पर पढ़ाई पूरी करना मेरे लिए सबसे बड़ी चुनौती थी.

अरुण प्रकाश

n पिताजी के गुजरने के बाद किस तरह पढ़ाई पूरी हुई और किस तरह जीवन को ठौर मिला?

मृत्यु से पूर्व पिताजी ने मेरी शादी करा दी थी. शादी की जिम्मेदारी और पढ़ाई को पूरा कर नौकरी ढूंढ़ने की बेचैनी थी. मैंने किन मुश्किलों और किन-किन के सहयोग से पढ़ाई पूरी की, यह वाकया एक अलग दास्तान है. पढ़ाई पूरी कर 1971 में हाथ में रिजल्ट लिये बिना मैं नौकरी ढूंढ़ने लगा था. 2-3 माह होटल क्लेरिजेज में वेटर की नौकरी की. फिर लोदी होटल में वेटर की नौकरी मिल गयी. लोदी होटल में अज्ञेय जी को खाना परोस कर खिलाने का सौभाग्य मुझे प्राप्त है. अज्ञेय जी इला डालमिया के साथ खाना खाने आये थे. अज्ञेय जी मुझे पहचानते थे, इसलिए कि अज्ञेय जी के भाई गोगरी जमालपुर में डॉक्टर थे. उनके डॉक्टर भाई मेरे पिताजी के द्वारा अज्ञेय जी के लिए कभी कुछ सामान भेजते थे तो मैं ही उन्हें पहुँचाने जाता था.

इला जी ने जब खाने के बाद टीप के पैसे ट्रे में रखे तो अज्ञेय जी ने उन्हें तत्काल रोक दिया था. मुझे वेटर के रूप में देखकर उनकी आँखें कुछ नम हो गयी थीं और खाने के टेबल पर वे कुछ गमगीन हो गये थे. होटल से छूटते हुए मुझे स्पर्श करते हुए उन्होंने आत्मीयता से मुझसे बातें की. मैं उन्हें गेट से बाहर छोड़ आया. उन्होंने छूटते हुए बहुत गंभीरता से मुझसे कहा- ‘कभी कोई परेशानी हो तो मुझे बता देना.’ भारतीय समाज में तब भी होटल में वेटर का काम सम्मानजनक पेशा नहीं था. मेरे लिए इससे ज्यादा सम्मानजनक कार्य दूसरा कुछ भी नहीं था. मुझे पहली बार वेटर का काम करते हुए आत्म-सम्मान महसूस हुआ था कि हिन्दी के एक महान लेखक अज्ञेय ने एक वेटर को इज्जत की नजर से देखा था. इसी रेस्तरां में मैंने कृष्ण मेनन को पहली बार देखा था.

n अरूण प्रकाश वेटर की जिंदगी से कब मुक्त हुए?

दो साल वेटर की शानदार जिंदगी जीने के बाद मैं पटना आ गया. 1972 में पटना के होटल नटराज में अस्टिेंट मैनेजर का काम मिल गया. इस होटल में मालिक के बाद प्रबंधन की मिल्कियत मेरे ही हाथ में थी. यहाँ आकर वेटर की जिंदगी से मुक्ति मिल गयी. 1973 में बरौनी फर्टिलाइजर में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी मिल गयी. अब हम भारत सरकार के गेस्ट हाउस में असिस्टेंट मैनेजर हो गये. नौकरी करते हुए जीवन थोड़ा व्यवस्थित हुआ तो सीपीआई के श्रमिक संगठन एटक के साथ कारखाना मजदूरों को संगठित करने में शक्ति लगायी. इस दौर में कारखाना से बाहर बीड़ी मजदूरों को संगठित करते हुए जीवन और समाज का अलग तजुर्बा हासिल हुआ. बरौनी में 12 वर्ष बिताने के बाद 1986 में फर्टिलाइजर में हिन्दी अधिकारी नियुक्त होकर दिल्ली आ गये.

n आपने लिखना कब शुरू किया?

लेखन मैं छात्र जीवन से ही कर रहा था पर कभी इस विधा को ज्यादा महत्व नहीं दिया. मंझौल के जगदम्बी पुस्तकालय, शोकहारा, बरौनी के संस्कृत महाविद्यालय पुस्तकालय और सर गणेशदत्त कॉलेज लाइब्रेरी से पढ़ते हुए मेरे भीतर जो पढ़ने की शैली विकसित हुई थी, बरौनी में कारखाना मजदूरों और बीड़ी मजदूरों के बीच नाटक करते हुए लेखकीय शिल्प की समझ विकसित हो रही थी. मेरे पिता साहित्य पढ़ने के शौकीन थे. वे जब भी यात्राओं से लौटकर घर आते थे तो साहित्यिक पत्रिकाएँ उनके झोले में भरी रहती थीं. मैंने प्रेमचंद, निर्मल वर्मा, चेखव, गोर्की सबको पढ़ा था पर मुझे अपना रास्ता खुद ही चुनना था. पढ़ना एक तहजीब है, उस पर चिंतन करना और अपने भीतर लेखकीय समझ विकसित करना दूसरी तहजीब है.

मैंने शुरू में कुछ कविताएँ अंग्रेजी में भी लिखीं. पटना के एक अंग्रेजी पत्र में कुछ अंग्रेजी कविताएँ छपी थीं. मेरी अंग्रेजी कविताई को किसी ने भाव नहीं दिया. मेरी पहली कहानी कॉलेज जीवन में ‘कहानीकार’ में छपी थी. पारिश्रमिक के 30 रुपये का मनिऑर्डर पहले मिल गया, कहानीकार की प्रति कुछ वर्ष बाद मिली थी. वह कहानी थी- ‘छाला’. बरौनी में जीवन कुछ व्यवस्थित हो रहा था पर जीवन राजनीतिक-सामाजिक कार्यों में ज्यादा गहन होता जा रहा था. ‘रक्त के बारे में’ 1978 में मेरा पहला कविता संग्रह प्रकाशित हुआ. मुझे पक्का भरोसा हो गया था कि कविताएँ लिखकर हम सारी बात नहीं कह सकते हैं. फिर कविता पर गद्य का प्रभाव हुआ.

n कवि अरूण प्रकाश कथाकार के रूप में कब प्रकट हुए?

बरौनी में रहते हुए ‘कोंपल कथा’ का फ्रेम दिमाग में तैयार हो गया था. ‘कोंपल कथा’ लिखने में 5 साल का दिमागी व्यायाम चलता रहा. यह काम मेरा पहला तसल्ली-बख्श काम था. बेगूसराय के एक स्थानीय साप्ताहिक में ‘कोंपल कथा’ सीरिज में छप रहा था. अचानक बंद हो गया, क्योंकि संपादक के जाति संस्कार पर कथा के पात्र-काल विन्यास से चोट लगी थी. ‘कोंपल कथा’ को 5 बार रीराइट किया. एक मित्र थे, निरंजन जी, वे गुजर गये. उन्होंने कई बार हमारा लिखा पढ़ा और मुझे बार-बार ठीक से सोचना पड़ा.

कमलेश्वर जी ने ‘गंगा’ के संपादकीय में लिखा था कि पंजाब में मजदूर मारे जा रहे हैं. बिहार, उत्तर-प्रदेश के हिन्दी साहित्य में कुछ नहीं हो रहा है. मैंने संपादक जी को चिट्ठी लिखी- एक नहीं, 20 कहानियां इस विषय पर लिखी गयी हैं. मैंने भी एक कहानी लिखी है. कमलेश्वर जी का फोन आया- आप अपनी कहानी भेज दो. ‘भैया एक्सप्रेस’ तीन बार दूसरी जगह छपने के बावजूद 1987 में ‘गंगा’ में प्रकाशित हुई. अब मैं हिन्दी अधिकारी होकर दिल्ली में रह रहा था.